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महर्षि अरविंद की सकरात्मक द्रष्टि

महर्षि अरविंद घोष अपने देश के जाने माने स्वतंत्रता सेनानी तथा माने हुए तत्वचिंतक थे। वे बडौदा  में इ.स. १८९४ से १९०६ के दौरान महाराजा सयाजीराव गायकवाड के निजी सचिव थे। तो चलो, हम भी श्री अरविंद के बचपन की थोड़ी बातें जानें।

श्री अरविंद बचपन से ही बहुत तेजस्वी थे। उनके पिता जी ने अरविंद और उनके दूसरे दो भाईयों के मेनचेस्टर में अनेक मित्र ड्यूएट के यहाँ पढ़ने भेजा।

थोड़े समय तक अरविंद और उनके भाईयों ने मिस्टर ड्यूएट से शिक्षा ली। लेकिन संयोगानुसार थोड़े समय के बाद ड्यूएट और उनकी पत्त्नी को ऑस्ट्रेलिया जाना पड़ा। इसलिए उन्होंने लंदन में एक घर किराए पर लिया और उसमे अपनी वृद्ध माता के साथ इन तीनों भाइयों की रहने की व्यवस्था की।

तीनों भाई लंदन में दादी माँ के साथ रहते थे। उनके पिता जी घर से नियमित पैसे नहीं भेज सकते थे। कई बार तो महीने बित जाते थे तो भी पैसा नहीं आता था। लेकिन दादी माँ थी इसलिए खाने-पीने की कोई तकलीफ नहीं थी। इस तरह तीन साल तो अच्छी तरह निकल गए।

लेकिन एक दिन ऐसी गडबड हुई कि सबकुछ उल्टा-सीधा हो गया। उसमे हुआ ऐसा कि दादी माँ को तीनों भाईयों को हर रोज़ प्रार्थना गाकर सुनानी पड़ती थी। साथ ही प्रार्थना के बाद धर्मग्रंथ में से एक पेज जोर-जोर से पढकर सुनाना पड़ता था। यह पढ़ने का काम अधिकतर भाई विनयभूषण ही करते थे। लेकिन एक दिन बीचवाले भाई मनमोहन ने पढ़ा। उस दिन मनमोहन का मिजाज ठिकाने पर नहीं था। धर्मग्रंथ पढ़ने से पहले वो जोर से बोले, "धर्मग्रंथ में जो लिखा है, उस तरह लोग चलते तो है नहीं, उसे बस पढ़ते ही रहते है।"

यह सुनकर दादी माँ क्रोधित हो गई। उनका गुस्सा भड़क उठा और बोली, "अरेरे, तुम तो घोर नास्तिक हो! धर्मग्रंथ का ऐसा अपमान कर रहे हो ? जाओ, अब मिझे तुम्हारे साथ नहीं रहना है. मै ये चली।" और वह सचमुच अपना सब सामान लेकर दूसरी जगह रहने चली गई।

और उस दिन से घर चलाने का पूरा खर्चा तीनों भाईयों के सिर पर आ पड़ा। अब घर का किराया कौन भरेगा ? फ़ीस भरने के पैसे भी नहीं थे, तो खानेपीने के लिए पैसे कहाँ से निकलेंगे ? ऐसी अनेक मुश्किलों ने उन्हें घेर लिया। किराया भरने का पैसा नहीं होने के कारण घर खाली करना पड़ा।

बड़े भाई विनयभूषण ने लिबरल क्लब के ऑफिस में हफ्ते के पांच पाउण्ड की नौकरी खोज ली। क्लब के पीछे एक तहखाने जैसा कमरा था, वह उन्हें रहने के लिए दिया। वास्तव में तो वह ऑफिस का गोडाउन था। हवा और रौशनी का तो नाम तक नहीं। लंदन की कातिल सर्दी में गर्मी दे ऐसा "फायर प्लेस" की भी कोई व्यवस्था नहीं थी, क्योंकि यह कमरा सामान रखने के लिए था। इन्सानों के रहने के लिए नहीं. इसके अलावा, वहां ट्रेनों के लगातार आने-जाने का शोर चलता ही रहता था।

लेकिन श्री अरविंद हिम्मत नहीं हारे। ऐसे तहखाने में, इस तरह के सतत शोर के बीच रहकर उन्होंने अपने स्कुल की पढ़ाई पूरी की। इसके अलावा उस कमरे में रहकर उन्होंने इटालियन, रशियन, स्पेनिश, जर्मन और ग्रीक भाषाएँ भी सीखीं। इतना ही नहीं, लेकिन उन्हें समग्र स्कुल में श्रेष्ठ साहित्य लिखने के लिए दिए जानेवाला "बटरवर्थ प्राइज" और इतिहास के लिए दिया जाता "वुडवर्थ प्राइज" भी मिला। और स्कुल के श्रेष्ठ विद्यार्थी की स्कोलर्शिप भी मिली।

देखा मित्रों, श्री अरविंद ऐसे प्रतिकूल संयोगों में भी कितनी उच्च पढाई कर सके ! तो चलो, आज हम भी तय करे, कि छोटी-बड़ी मुश्किलों से निराश हुए बिना पोजिटिव रहकर पार निकल जाएँगे।

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