चंडकौशिक

             एक बार भगवान महावीर एक गाँव से दूसरे गाँव जा रहे थे। रास्ते में एक ग्वाले ने उन्हें यह कहते हुए रोका, "देवार्य, इस मार्ग पर कनकखल नाम का एक आश्रम है। वहाँ एक भयंकर जहरीला सर्प रहता है। उसका नाम चंडकौशिक है। उस साँप की दृष्टि भी जहरीली है। उसकी नज़र पड़ते ही मनुष्य जल जाता है।"

                यह वात सुनकर भगवान के चेहरे पर भय की एक रेखा भी नहीं दिखाई दी। वे आगे बढ़ने लगे।

                ग्वाले ने फिर से भगवान को रोककर कहा, "पहले आप मेरी बात सुनें, फिर आगे कदम बढ़ाएँ।“

             कौशिक नाम का एक तापस आश्रम का कुलपति था। वह बहुत क्रोधी था। उस आश्रम के बगीचे में बच्चे खेलने के लिए आते थे। बच्चे वहाँ पर शरारत करते थे जो कौशिक को अच्छा नहीं लगता था। वह लकड़ी लेकर बच्चों के पीछे दोड़ता। डर के कारण बच्चे वहाँ से भाग जाते।

                बच्चों ने चिढ़ाने के लिए कौशिक का नया नाम रखा : ‘चंडकौशिक’ चंड यानी गुस्सेबाज-कौशिक!

                "एक दिन कौशिक कहीं बाहर गया हुआ था तब बच्चों ने बगीचे को तहस-नहस कर दिया। बगीचे की ऐसी हालत देखकर कौशिक बहुत क्रोधित हुआ। उसने पास में पड़ी कुल्हाड़ी उठाई और बच्चों के पीछे दौड़ा। बीच में एक गहरा गड्ढा था। तापस को दिखा नहीं और वह उस गड्ढे में गिर गया। उसकी कुल्हाड़ी उसी के सिर पर गिरी और वहीं पर उसकी मृत्यु हो गई। तापस मरकर साँप बन गया। और अब वह उस आश्रम में किसी को भी जीवित नहीं छोड़ता।" ग्वाले ने अपनी बात पूरी की।

                भगवान ने ग्वाले को प्रेमभरी द्रष्टि से देखा और अपने मार्ग पर आगे बढ़ गए। थोड़ी देर में वे आश्रम पहुँचे। चंडकौशिक साँप को मनुष्य की गंध आई। उसने भगवान के उपर जहर की पिचकारी छोड़ी। लेकिन उसे यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि उसके द्वारा की गई विषवर्षा के बाद भी वे बिना हिले-डुले अडिग खड़े थे।       

   फिर उसने पास जाकर महावीर के अंगुठे पर जोर से डंख मारा। अंदर से सफेद दूध** जैसे रक्त का फव्वारा निकल पड़ा। लेकिन महावीर के चहरे से प्रेम छलक रहा था! क्रोध का भंडार चंडकौशिक यह देखकर स्तब्ध रह गया। तभी भगवान महावीर के मुँख से शब्द निकले, ऐसे लगा मानो सूखी भूमी पर वर्षा हुई हो।            

 "चंडकौशिक, समझ! समझ! जो डरता नहीं, डराता नहीं वह वीर है! क्रोध का स्वभाव तो जलाना है। पहले खुद जलता है और फिर दूसरों को जलाता है, आग की तरह। क्रोध से हारकर तुमने कितने ही जन्म बिगाड़ दिए। लेकिन आज तुम हारकर जीत जाओ, चंडकौशिक।"

                भगवान के सच्चे प्रेम भरे शब्दों से पत्थर दिल साँप भी पिघल गया। उसे अपना पिछला भव दिखाई दिया और उसे समझ में आया कि क्रोध के कारण उसने अपने कितने जन्म बिगाड़ दिए।

             चंडकौशिक ने भगवान से क्षमा मांगी, "क्षमा करो करुणावतार ! मैंने आपको जहरीला डंख मारा। और आपने मुझे ज्ञानरूपी अमृत पिलाकर मेरा कल्याण कर दिया।"

 

* तीर्थंकर भगवान का रक्त सफेद होता है| 

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