नयसार

महाविदेह क्षेत्र में नयसार नामक एक लकड़हारा रहता था। जंगल से लकड़ी काटकर लाना उसका व्यवसाय था। एक बार वह अपने आदमियों को साथ लेकर लकड़ी काटने जंगल में गया। वह एक जगह बैठा था और उसके नौकर लकड़ी काट रहे थे l दोपहर हो गई। खाने का समय होने पर एक नौकर ने आकर नयसार से कहा, “भोजन तैयार है खाने के लिए पधारें।” 

नयसार संस्कारी था। उसका नियम था कि वह किसी अतिथि को भोजन कराने के बाद ही भोजन करता था। इसलिए वह वहाँ स्थित तालाब की मेड़ पर चढ़कर किसी अतिथि के आने की राह देखने लगा। पुण्य के योग से, नयसार की अतिथि को भोजन कराने के बाद खुद भोजन करने की प्रबल इच्छा सफल हुई।

जंगल के बाहर के मार्ग से मुनियों का एक समूह एक गाँव से दूसरे गाँव की ओर विहार कर रहा था। उनमें से एक मुनि जिन्होंने एक महीने के उपवास का तप किया था, वे चलते-चलते पीछे छूट गए और रास्ता भूलकर जंगल में गलत रास्ते पर चले गए। दोपहर के समय वे उस स्थान पर पहुँच गए जहाँ नयसार का पड़ाव था। तपस्वी मुनि को देखकर नयसार को मानो कोई रत्नो का खजाना मिल गया हो उससे भी अधिक आनंद हुआ। वह उल्लासपूर्वक मुनि के पास गया और उन्हें प्रणाम करके उन्हें सम्मान देकर, उनसे भोजन करने की विनती की।  

नयसार ने तपस्वी मुनि को आदर-सत्कार सहित, उच्च भावनापूर्वक भोजन दिया। 
मुनि के भोजन करने के बाद नयसार ने भोजन किया। भोजन के पश्चात मुनि को जिस गाँव जाना था वहाँ तक छोड़ने उनके साथ गया। रास्ते में चलते हुए मुनि को विचार आया, “इस मनुष्य ने मुझे जंगल की भटकन से बाहर निकालकर रास्ता बताया है। मैं उसे संसार की भटकन में से निकलने का आत्महित का मार्ग बताऊँगा।” यह सोचकर मुनि ने नयसार लकड़हारे को देव, गुरु और धर्म के विषय में समझ प्रदान की और आत्मस्वरूप रहने की दृष्टि दी।

इस तरह नयसार लकड़हारे ने तपस्वी मुनि से आध्यात्मिक धन प्राप्त किया। शुद्ध भाव से मुनि के कथनों की आराधना करते हुए उसने अपना आयुष्य पूरा किया और अगले भव में देवलोक में देव के रूप में जन्म लिया।
देखा मित्रों, उच्च भावना से किए हुए आहारदान का परिणाम कितना ऊँचा आया! आत्मदृष्टि प्राप्त हुई जो मोक्ष में ले जाएगी और दूसरे भव में देवलोक का वैभव प्राप्त हुआ। 

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