पुनिया श्रावक सामायिक और आदर्श भक्ति का एक उदाहरण थे। वह एक ऐसे श्रावक थे कि जिनकी धर्म भावना की तारीफ खुद भगवान महावीर ने की थीं।
हँसी खुशी गरीबी स्वीकार करनेवाले पुनिया ने अपनी सारी पैत्रिक संपत्ति का दान किया था और खुद रूई की बाती (पुनिया) बनाने से मिलनेवाले लगभग दो आने में संतोष से जीते थे।पुनिया श्रावक को प्रभु के प्रति अपार भक्ति थी। इसी तरह प्रभु की भक्ति करनेवाले अन्य श्रावकों (वीतराग प्रभु को माननेवाले) के प्रति भी उन्हें अपार स्नेह था। इसलिए रोज़ पति-पत्नी एक श्रावक को अपने यहाँ निमंत्रण देकर प्रेम से खिलाते थे।

जिसके कारण दोनों को एकांतर (एक दिन छोड़कर, दूसरे दिन उपवास) व्रत करना पड़ता था। ऐसे बारह व्रतधारी पुनिया आत्मसमभाव में एकाकार होकर रोज़ एक सामायिक करते थे।

एक दिन सामायिक में पुनिया श्रावक का चित्त स्थिर नहीं रह पा रहा था। इससे पुनिया के अंतर में चंचलता जागी। ऐसा क्यों हो रहा है? उसने अपनी पत्नी से बात की "आज सामायिक में मेरा चित्त स्थिर नहीं रह पा रहा था। इसका क्या कारण हो सकता है। यह मुझे समझ में नहीं आ रहा है।“
आत्मजागृत पुनिया की बात ने उसकी पत्नी को सोच में डाल दिया। थोड़ी देर बाद याद आने पर उसने कहा, "में गाँव से वापस आ रही थी, तब रास्ते पर गोवर पड़ा था वह में घर ले आई हूँ। इसके अलावा और कुछ नहीं लाई।" पुनिया श्रावक के जागृत आत्मा ने कहा, "अरे,, रास्ते में पड़ा गोबर, वह अपना नहीं कहलाता। जिस पर किसी का अधिकार न हो, उस पर राज्य का अधिकार होता है। अपने लिए यह अवैध कहलाएगा। जाओ, गोवर जहाँ था, वहाँ वापस रखकर आओ।"
पुनिया की आत्म जागृति इतनी थी कि एक छोटी सी गलती भी उनके अंतर को अस्थिर कर देती।
एक बार महाराज श्रेणिक ने भगवान महावीर से पूछा, कि "मृत्यु के बाद मेरी कौन सी गति होगी?" तव भगवान महावीर ने बताया, "नर्क गति होगी।" अपने परम भक्त से भी प्रभु सच्ची बात कहने से हिचकते नहीं थे। राजा श्रेणिक ने इसमें से छूटने का उपाय पूछा तब भगवान ने कहा, "यदि पुनिया श्रावक की सिर्फ एक सामायिक का पुण्य मिल जाए तो तुम्हारी नर्क गति टल जाएगी।"
नर्कगति टलने का उपाय मिलते ही राजा खुश हो गए। किसी से कुछ भी खरीदना राजा के लिए कोन सी बड़ी बात थी। और वह भी पुनिया जैसे दीन से। राजा तो पुनिया श्रावक की सामायिक खरीदने गए।

बात सुनकर पुनिया ने राजा से कहा, "मेरी सामायिक का मूल्य तो भगवान ही बता सकते हैं। मुझे क्या समझ में आए? इसलिए आप कृपा करके उनसे ही पूछ आएँ।"
श्रेणिक भगवान के पास वापस गए। विनयपूर्वक सारी बात कही और पूछा, "प्रभु आप ही बताइए कि पुनिया की सामायिक की में क्या कीमत हूँ ताकि मेरी नर्क गति टल जाए?"
भगवान ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "पुनिया की सामायिक का मूल्य देना असंभव है। हे राजन! तुम्हारा पूरा राज्य तो सिर्फ उसकी दलाली (कमीशन) में ही चला जाएगा। एक पूरी सामायिक की कीमत तो इससे अनेक गुना अधिक है।"
राजा तो यह सुनते ही रह गए, "क्या? इतनी उच्च सामायिक कि मेरा पूरा राजपाट दलाली में ही चला जाएगा?"
राजा निराश हो गए, लेकिन साथ ही साथ सच्चे श्रावक पुनिया की धर्मभावना को मन ही मन बंदन कर रहे थे।
प्रभु महावीर के स्वमुख से जिसकी तारीफ हुई हो, रनिया श्रावक को धन्य है।



