अभिप्राय भटका देते हैं

     चंपानगरी में जितशत्रु नाम का राजा राज्य करता था उनकी रानी  का नाम धारिणी और पुत्र  का नाम अदीनशत्रु था। वे  वीतराग धर्म के परम आराधक थे उनके प्रधान का नाम सुबुद्धि था  चंपा नगरी के बाहर पूर्णभद्र यक्ष का मंदिर और सुंदर बगीचा था।  नगरी के चारों और घाटियाँ थी।  घाटी के ईशान कोने में थोड़ा पानी था, उसमें से संड़ाध की बदबू आ रही थी। 

     एकबार जितशत्रु राजा, दूसरे राजाओं  के साथ स्वादिष्ट भोजन लेकर , पान - सुपारी चबाते-चबाते भोजन की बहुत तारीफ़ कर रहे थे।  सुबुद्धि प्रधान के अलावा अन्य सभी लोगों ने भी प्रसंशा का अनुमोदन किया।  सुबुद्धि की तरफ से जब अनुमोदन नहीं मिला , तब सिर्फ उन्हें मौन देखकर राजा ने सुबुद्धि को संबोधित करके फिर से भोजन आदि की बहुत तारीफ की और उनका अभिप्राय पूछा। 

     सुबुद्धि प्रधान ने विनयपूर्वक कहा , " महाराज ! उसमें तारीफ करने जैसा कुछ था, ऐसा मेँ नहीं मानता। जड़ वस्तु का स्वभाव ऐसा है, जो आज अच्छा है, वह कल खराब पुद्ग़ल अच्छा हो जाता है, ऐसे परिवर्तन होते ही रहता है।  अतः खाने की चीजों के लिए क्या आश्चर्य करना ?" यह बात राजा को अच्छी नहीं लगी, लेकिन वाद-विवाद न हो, इसलिए राजा ने वह बात छोड दी। 

     एक बार राजा, सुबुद्धि प्रधान और कई परिवारों के साथ गाँव के बाहर ईशान कोने की तरफ गए। वहाँ खाई के गंदे पानी कि बदबू से होनेवाली परेशानी की बात करने लगे। सुबुद्धि प्रधान के अलावा दूसरे सभी लोगों ने राजा कि बात का अनुमोदन किया, लेकिन सुबुद्धि प्रधान कुछ भी नहीं बोले। पहले की तरह राजा ने फिर से पूछा, प्रधान ने कहा, “अच्छे का खराब और खराब का अच्छा होना यह पुदगल स्वभाव है, इसमें क्या तारीफ करना या क्या बुराई करना?” यह बात भी राजा को अच्छी नहीं लगी। इसलिए प्रधान ने राजा को अपनी बात का प्रत्यक्ष अनुभव करवाने का निश्चय किया।

एक रात प्रधान ने अपने खास विश्वसनीय नौकर से कुम्हार के यहाँ से नया बड़ा सा मिटटी का मटका मँगवाया और उसमें खाई का दुर्गंधवाला पानी भरा । उस पानी में राख डालकर मटके का मुँह बंद करके रख दिया । इस तरह सात दिन तक सात बार यही विधि करने से पानी मीठा, रोचक, हल्का और शरीर के लिए गुणकारी हो गया।

एक दिन प्रधान ने अपने विश्वसनीय आदमी से वह शुद्ध किया हुआ पानी, भोजन के समय राजा को पीने के लिए भेजा । पानी राजा को बहुत मीठा लगा । उन्होंने पानी लानेवाले से पूछा “ यह मीठा पानी कहाँ से लाए?” जवाब में उसने कहा कि सुबुधि प्रधान ने भेजा है । राजाने प्रधान को बुलाकर कहा, “हे प्रधान! तुम्हें मेरे लिए क्यों अभाव है, कि तुम हमेशा एसा मीठा पानी पीते हो, जब कि मेरे लिए कभी नहीं भेजते? यह पानी कहाँ से मँगवाते हो?”

प्रधान ने कहा,”महाराज! यह घाटी का दुर्गंधवाला पानी ही है।“ राजा ने यह बात नहीं मानी। प्रधान ने कहा,”यदि आप यह बात नहीं मान रहे हैं तो आप भी एसा ही करके देख सकते हैं” राजा ने प्रमाण सिद्ध करने के लिए खुद यह प्रयोग करके देखा । सुबुद्धि प्रधान की बात सही निकली।

राजा ने कहा, “प्रधान, तुम्हारी बात सही है। अच्छे में से खराब होना और खराब में से अच्छा होना, यही पुदगल का स्वभाव है और यह कुदरती है। अत: किसीकी तारीफ करने जैसा भी नहीं है और ना ही किसीकी बुराई करने जैसा।“

देखा मित्रो, हम भी अगर यह समझें तो हमें भी कहीं पकड़ नहीं रहेगी।

 

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