ऋषभदेव भगवान का ‘अक्रम ज्ञान’



ऋषभदेव दादा भगवान के सौ पुत्र, उनमें से निन्यानवे को उन्होंने दीक्षा देकर मोक्ष दिया था |

सबसे बड़े पुत्र, वे भरत चक्रवर्ती | उन्हें राज्य चलाने के लिए सौंपा | भरत राजा तो लड़ाईयाँ लड़ते-लड़ते और महल में तेरह सौ रानियों से ऊब गए |

वे भगवान के पास गए और उन्होंने भी दीक्षा मांगी और मोक्ष माँगा | भगवान ने कहा की, “यदि तू भी राजपाट छोड़ देगा तो फिर राज्य कौन सँभालेगा? इसलिए तुजे तो राज्य सँभालना पड़ेगा, लेकिन साथ-साथ मैं तुजे ऐसा ‘आक्रमज्ञान’ दूँगा की लड़ाईयाँ लड़ते हुए, राज्य भोगते हुए और तेरह सौ रानियों के साथ रहकर भी तेरा मोक्ष नह

वे भगवान के पास गए और उन्होंने भी दीक्षा मांगी और मोक्ष माँगा | भगवान ने कहा की,“यदि तू भी राजपाट छोड़ देगा तो फिर राज्य कौन सँभालेगा? इसलिए तुजे तो राज्य सँभालना पड़ेगा, लेकिन साथ-साथ मैं तुजे ऐसा ‘आक्रमज्ञान’ दूँगा की लड़ाईयाँ लड़ते हुए, राज्य भोगते हुए और तेरह सौ रानियों के साथ रहकर भी तेरा मोक्ष नहीं जाएगा |"

तो वैसा अद्भुत ज्ञान दिया ! वही ‘अक्रमज्ञान’ |

शास्त्रो में मोक्ष पाने के लिए दो मार्ग बताये है | १) क्रमिक मार्ग- जिसमे एक एक सीडी चढ़नी पड़ती है २) जबकि अक्रम मार्ग लिफ्ट मार्ग है| अक्रम ज्ञान से शाश्वत सुख और आनंद खूब ही सरलता से प्राप्त होता है|